Tarbuj ki kheti kaise kare (तरबूज़ की खेती कैसे करे)

हमारे देश में तरबूजे की बुवाई का समय नवम्बर से अप्रेल तक है।
ये कम समय, कम खाद और कम पानी में उगाई जा सकने वाली फसलें हैं। उगने में सरल, बाजार तक ले जाने में आसानी और अच्छे बाजार भाव से इसकी लोकप्रियता बढाती जा रही हैं इसके कच्चे फलो का उपयोग सब्जी के रूप में किया जाता हैं।

भूमि व जलवायु

तरबूज के लिए अधिक तापमान वाली जलवायु सबसे अच्छी होती है । गर्म जलवायु अधिक होने से वृद्धि अच्छी होती है । ठण्डी व पाले वाली जलवायु उपयुक्त नहीं होती । अधिक तापमान से फलों की वृद्धि अधिक होती है । बीजों के अंकुरण के लिये 22-25 डी०से०ग्रेड तापमान सर्वोत्तम है तथा सन्तोषजनक अंकुरण होता है । नमी वाली जलवायु में पत्तियों में बीमारी आने लगती है।

खेत की तैयारी

तरबूजे के लिए रेतीली तथा रेतीली दोमट भूमि सबसे अच्छी होती है । इसकी खेती गंगा, यमुना व नदियों के खाली स्थानों में क्यारियां बनाकर की जाती है । भूमि में गोबर की खाद को अच्छी तरह मिलाना चाहिए । अधिक रेत होने पर ऊपरी सतह को हटाकर नीचे की मिट्‌टी में खाद मिलाना चाहिए । इस प्रकार से भूमि का पी. एच. मान 5.5-7.0 के बीच होना चाहिए ।

भूमि की तैयारी

आवश्यकता अनुसार जुताई कराकर खेत को ठीक प्रकार से तैयार कर लेना चाहिए तथा साथ-साथ छोटी-छोटी क्यारियां बना लेनी उचित रहती हैं । भारी मिट्‌टी को ढेले रहित कर बोना चाहिए । रेतीली भूमि के लिये अधिक जुताइयों की आवश्यकता नहीं पड़ती । इस प्रकार से 3-4 जुताई पर्याप्त होती हैं ।

खाद एवं उर्वरक

तरबूजे को खाद की आवश्यकता पड़ती है । गोबर की खाद 20-25 ट्रौली को रेतीली भूमि में भली-भांति मिला देना चाहिए । यह खाद क्यारियों में डालकर भूमि तैयारी के समय मिला देना चाहिए ।

80 कि.ग्रा. नाइट्रोजन प्रति हैक्टर देना चाहिए तथा फास्फेट व पोटाश की मात्रा 60-60 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर की दर से देनी चाहिए। फास्फेट व पोटाश तथा नाइट्रोजन की आधी मात्रा को भूमि की तैयारी के समय मिलाना चाहिए तथा शेष नाइट्रोजन की मात्रा को बुवाई के 25-30 दिन के बाद देना चाहिए ।

तरबूज की जातियां

आसाही-पामाटो :-

इस किस्म के फल मध्यम आकार के, छिलका हल्का हरा होता है । गूदा लाल, मीठा तथा फल के छोटे बीज होते है । फल 6-8 कि.ग्रा. वजन के होते हैं तथा 90-100 दिनों में तैयार हो जाते हैं ।

शुगर बेबी :-

यह किस्म भी 95-100 दिनों मे तैयार होती है जिनका छिलका ऊपर से गहरे रंग की हल्की गहरी धारियां लिये हुये होता है । गूदा गहरा लाल, मीठा तथा बीज भी छोटे होते हैं । फल छोटे व मध्यम आकार के होते हैं ।

न्यू हेम्पसाइन मिडगेट :-

यह किस्म गृह-वाटिका के लिये बहुत ही उपयुक्त होती है । इसके फल 2-3 किग्रा. के होते हैं । फल अधिक लगते हैं । छिलका हल्का हरा काली धारियों के साथ होता है । गूदा लाल, मीठा होता है ।

बगीचों के लिये :-

तरबूजे की फसल के लिए खाद 5-6 टोकरी तथा यूरिया व फास्फेट 200 ग्राम व पोटाश 300 ग्राम मात्रा 8-10 वर्ग मी. क्षेत्र के लिए पर्याप्त होती है । फास्फेट, पोटाश तथा 300 ग्राम यूरिया को बोने से पहले भूमि तैयार करते समय मिला देना चाहिए । शेष यूरिया की मात्रा 20-25 दिनों के बाद तथा फूल बनने से पहले 1-2 चम्मच पौधों में डालते रहना चाहिए ।

दूरी तरबूज के पौधे की

बुवाई के समय दूरी भी निश्चित होनी चाहिए । जाति व भूमि उर्वरा शक्ति के आधार पर दूरी रखते हैं । लम्बी जाति बढ़ने वाली के लिए 3 मी. कतारों की दूरी रखते हैं तथा थामरों की आपस की दूरी 1 मीटर रखते हैं । एक थामरे में 3-4 बीज लगाने चाहिए तथा बीज की गहराई 4-5 सेमी. से अधिक नहीं रखनी चाहिए ।

कम फैलने वाली जातियों की दूरी 1.5 मी. कतारों की तथा थामरों की दूरी 90 सेमी. रखनी चाहिए । बगीचों के लिये कम क्षेत्र होने पर कम दूरी रखने की सिफारिश की जाती है तथा न्यू हेम्पशाइन मिडगेट को बोना चाहिए ।

बीज की मात्रा एवं बोने का ढंग

इसकी दूरी बीज की मात्रा बुवाई के समय, जाति तथा बीज के आकार व दूरी पर निर्भर करती है । नवम्बर-दिसम्बर में बोई जाने वाली फसल में बीज अधिक, फरवरी-मार्च में बोई जाने वाली फसल में बीज कम लगते हैं । इसलिए औसतन बीज की मात्रा 3-4 किलो प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता पड़ती है । बीजों को अधिकतर हाथों द्वारा लगाना प्रचलित है । इससे अधिक बीज बेकार नहीं होता है तथा थामरों में हाथ से छेद करके बीज बो दिया जाता है।

तरबूज की खेती के रोग

तरबूजे के लिये भी अन्य कुकरविटस की तरह रोग व कीट लगते हैं लेकिन बीमारी अधिकतर क्यूजैरीयम बिल्ट व एन थ्रेकनोज लगती है तथा कीट रेड बीटिल अधिक क्षति पहुंचाते हैं | बीमारी के लिए रोग-विरोधी जातियों को प्रयोग करना चाहिए तथा कीटों के लिए डी.टी.टी. पाउडर का छिड्काव करना चाहिए । ध्यान रहे कि रासायनिक दवाओं के प्रयोग के बाद 10-15 दिन तक फलों का प्रयोग न करें तथा बाद में धोकर प्रयोग करें ।

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